Monday, June 26, 2017

धैर्य

रिजल्ट आया है आज शाम, चयनित छात्रों में मेरा नाम नहीं था इसलिए माथा फ्लैशबैक में बीते इवेंट्स को सोच-सोचकर भारी हुआ जा रहा था। कि किस तरह बहुत सारी परिस्थितियों से समझौते करते हुए, बच्चों की खुशियों को ताक पर रखते हुए, घर के बहुत से जरुरी कामों को छोड़कर, मन की बहुत सारी इच्छाओं को दमित कर अपने आपको किताबों के हवाले कर दिया था। बावजूद इसके में कट ऑफ मार्क से थोड़ा कम पड़ गया।
ऐसा होता है हर ख्वाहिश हमारी पूरी हो जरूरत नहीं, सच कहा है किसी ने सपने देखते हुए थोड़ी सावधानी जरूरी है। ऐसा नहीं है कि यह लक्ष्य बहुत मुश्किल है जिसे छुआ नहीं जा सकता पर "आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक" फिर कौन जीता है जुल्फ के सर होने तक...
इस छोटी सी जिंदगी में हजारों छोटी-छोटी ख्वाहिशे है तमन्नाए है पर उस पर हमारी ईगो भरी एक भारी भरकम ख्वाहिश का साया है जो सभी छोटी ख्वाहिशों की हिस्से का पोषण अपनी लंबी जड़ों से सोख लेती है। छोटी ख्वाहिशें भी यह सोच कर दम तोड़ देती है कि उनका समर्पण बेकार नहीं जाएगा और एक दिन यह बड़ी ख्वाहिश बड़े छायादार और फलदार वृक्ष में तब्दील हो जाएंगी तब हमारी अधूरी ख्वाहिशें पूरी होंगी। पर यह नादान यह नहीं जानती की वक्त की कुल्हाड़ी ख्वाहिशों की नब्ज़ न काटे यह तकदीर और प्रार्थनाओं पर निर्भर है। परिणाम को देख कर दिल ग़ालिब हुए जा रहा हैं "बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले"
अब दिल को बहलाने के लिए सब्र हिम्मत और मजबूत इरादों की प्रार्थनाओं का दौर चलेगा। मां बाप कितनी जल्दी अपने आपको हसरतो और हालातो के बीच एडजस्ट कर लेते हैं। जो मेरे सफल होने के समाचार की बड़ी शिद्दत से इंतजार कर रहे थे। जैसे ही पता चला कि मैं ऐसा नहीं कर पाया तुरंत बोले "हमें क्या जरूरत है ठीक है एग्जाम था दिया" एक पल में ऐसा एहसास करा दिया कि जैसे यह सबसे तुच्छ एग्जाम जो उनके बेटे की विलक्षण प्रतिभा के आंकलन में नाकामयाब रहा ।
तभी कहा जाता है कि आपके अपने परिवार से ज्यादा आपका और कोई नहीं होता। मुझसे खुशी या गम कुछ भी छुपाया नहीं जाता। और ना ही छुपाने का कभी कोई इरादा रहता है ।
कुछ दिनों से घर मे छोटे बड़े सब मेरे मोबाइल पर सोशल मीडिया यूज़ करने से चिढ़े हुए रहते थे। इस बात का मुझे इल्म था मैं खुद भी चाहता था की उसको मैं कम करूं। असल में मेरे WhatsApp और Facebook पर बहुत सारे स्टडी रिलेटेड ग्रुप से है लेकिन में मानता हूं हर बार यहां पढ़ाई की बातें नहीं होती। इधर-उधर के गप्पे मारा करते हैं।
मैं इंटेंशनली इन गप्पेबाजो को एक्सेस नहीं करता हूँ । नेट पर कुछ सर्फ करते हुए बहुत बार नोटिफिकेशन आ जाते हैं। कभी गलती से भी क्लिक हो गया तो यह आपको उसी दोस्तों की महफिल में ले जाते हैं। जहां से आपका वापस आना दोस्तों की इजाजत पर निर्भर करता है। इसी तरह अक्सर औकात पढ़ाई के बदले दोस्तों के साथ बतियाने में बीत जाती हैं । इस बार मैंने सोच रखा था कि मेरा रिजल्ट कुछ भी हो। मेंस में अगर पास हुआ तो इंटरव्यू की तैयारी के लिए और अगर नहीं हो पाया तो फिर से प्री की तैयारी के लिए मैं इन दोस्ती के अड्डो सोशल मीडिया से वैलिड दूरी बना लूंगा । पर रिजल्ट देखते ही लेफ्ट हो जाना मुझे थोड़ा कायरता जैसा लगा इसलिए मैंने फैसला किया है की ग्रुप से लेफ्ट होने के बजाए एप्लीकेशन को ही अनइंस्टॉल कर दो ताकि ना रहेगा बांस ना नीरो बांसुरी बजाएगा फिर रोम के जलने का सवाल ही नहीं लेकिन उन रिश्तेदारों का क्या जो कब से बाट देख रहे थे मेरे परिणाम की, उन दोस्तों की जिज्ञासाओं का क्या जो हर बार मिलने पर RAS क्या हाल है भाई तेरे बोल के संबोधित करते थे?? इसलिए मैंने सोचा की Facebook और WhatsApp Twitter पर एक सांकेतिक संदेश छोड़ दूं ताकि सब को फोन करके मेरा परिणाम जानने की तकल्लुफ न करना पड़े। ना पास हुआ है ऐसा तो क्या लिखता फिर मैंने अपनी इज्जत को थोड़ी नरमी बख्शी और लिखा पेशेंस इज़ इंपॉर्टेंट फॉर सक्सेस की धैर्य सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है मैं खुद ही अपने आपको समझा रहा था यह पढ़ पढ़ कर समझदार हो गया हूं।
एक दिन बीता है WhatsApp Facebook और Twitter के बिना, शुरू में थोड़ी सी विड्रॉल सिम्टम्स आ रहे थे पर लक्ष्य बड़ा है तो समर्पण भी बड़ा चाहिए। क्या फर्क पड़ जाएगा अगर अपने दिमाग की जीत के लिए थोड़ा बहुत मन हार जाऊं?
यह एग्जाम जो शुरुआत में मेरी ज़िद था अब मेरी आशिकी बन गया है और आशिकी सब्र चाहती है और तमन्नाओं की बेताबी को इशारो से खामोश करती है अब रामप्रसाद बिस्मिल की तरह सरफरोशी वाली फिलिंग हमारे भी दिल में हैं देखना है जोर कितना बाजुए आरपीएससी के है।😉😀
जय हो।

Saturday, June 17, 2017

जस्टिस डिलेड जस्टिस डिनाइड।

टाडा कोर्ट ने ढाई सौ लोगों के हत्यारों को आरोपित साबित करने में 24 वर्ष लगा दिए।

  मी लार्ड न्याय में इतनी देरी होना अन्याय नही है क्या?? बस एक बार अपनो को खो चुके उन प्रतिशोध की आग में जलने वालो कि नज़र से देखो उन बीते हुए सालो की तरफ।
जुडिशरी और लेजिसलेचर के टाँग ख़ेचु इगोइज़म में व्यवस्थाओं की धज्जियां उड़ गई है।
 
करीब 30 मिलियन केसेज पेंडिंग है । 70 हजार के करीब सुप्रीम कोर्ट में और अन्य लोअर कोर्ट्स में। वकीलों के स्वर्ग बन चुके देश मे शीघ्र न्याय की अपेक्षा बेईमानी लगती है।
ट्रायल और हियरिंग का बढ़िया सा कोई सॉफ्टवेयर बना दो बंगलुरू वालो। नही तो मैनुअल कछुआ चाल सुनवाइयों में तो मुजरिम पर्याप्त सजा पाए बिना ही निकल लेंगे बड़ी यात्रा को।
#Kapil

#Judiciary
 Better Late than never...

योग योग की बात है।

हम अच्छे से जानते हैं की भोली शक्ल वाले,साफ दिल वाले, प्रतिभाशाली, सुसभ्य, सु संस्कृतिक इंसान की तरफ हमारा आकर्षण सहज ही हो जाता है इसी फिनोमिनन को ध्यान में रखकर एक अमरीकी प्रोफेसर जोसफ न्ये ने शब्द दिया था सॉफ्ट पॉवर।
सॉफ्ट पावर का अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिहाज से बड़ा ही महत्व है सॉफ्ट पावर को हम यूं समझ सकते हैं कि यह किसी भी देश का वह चुंबकीय आकर्षण है जो अन्य देशों को अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत से अपनी तरफ खींचे।
भारत में सॉफ्ट पावर बनने की अपार संभावना है हमारा हर एक ग्रंथ और वेद संभावनाओं की प्रचुरता का बखान करता है पर फिर भी आज हम विश्व के शीर्ष 30 सॉफ्ट पावर देशो में सम्मिलित नहीं हो पाए हैं क्यों???  कमी है इच्छाशक्ति की कमी है विजन की कमी है मार्केटिंग की
जंगल में मोर नाचा किसने देखा??

इतने सालों बाद कोई जब इन सॉफ्टपावर प्रोडक्ट्स की मार्केटिंग कर रहा है तो हम उसकी विदेश यात्राओं का मजाक बना लेते है । असल मे हम बहुत की कन्फ्यूज्ड है हमे खुद नही पता कि हम चाहते क्या है। विदेश यात्राओं पे तंज कसने वाले कुछ विपक्षी छुटभैया नेताओं को तो हमारे ग्लोब के कई देशों के नाम भी PM मोदी की यात्राओं के बाद पता चले होंगे। उन्हें कौन समझाए की उन यात्राओं की वजह से विश्वभर के लोग हमें सुनने लगे है। इंडियन डायस्पोरा को संबोधित करते बहुत मीडिया कवरेज पाया है pm ने विदेशो में भी। इस वजह से वहा के लोगो की भारत मे दिलचस्पी बढ़ने लगी है। कल्चरल टूरिस्म बढ़ रहा है। भारत की संस्कृति और आर्थिक संभावनाओं के गुणगान और प्रचार के अथक प्रयासों का परिणाम है कि हाल ही में यूनाइटेड नेशन की आर्थिक और सामाजिक काउंसिल के चुनाव में भारत को अपने अगले कार्यकाल के लिए 183 मतों से चुना गया जबकि हमारे पड़ोसी पाकिस्तान को मात्र 1 वोट मिला हैं। उन यात्राओं का सामरिक महत्व समझना होगा उनका उपहास करने से पहले।

21जून को पूरे तीन साल होंगे योग दिवस को मनाना प्रारम्भ किये हमे। ये जानकर ताज्जुब होगा कि मोहनजोदड़ो से मिली प्राचीन पशुपति मुहरों पर बनी योग मुद्राओ का साक्ष्य कहता है कि योग भारत की करीब 10000 साल पुरानी एसेट हैं। ये विजन की कमी ही तो थी जो अब लोग इतने सालों बाद इसका मतलब समझ रहे है।
आइसोलेशन के दौर में लोगो को आपस मे जोड़ने का योग से बेहतर कोई विकल्प नही। योग जोड़ता है मनुष्य के तन, मन और चिंतन को। हिन्दू दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव आत्मा, परमात्मा का ही अंश है इन आत्मा और परमात्मा को जोड़ने की प्रक्रिया मानते थे ऋषि मुनि योग को।

नैतिक और चारित्रिक पतन का कारण है हैबिट्स में डिसिप्लिन का न होना जिससे हमारे शब्दो पर हमारा कंट्रोल कम होता जाता है। जो मानसिक शांति से पुनः प्राप्त किया जा सकता है। जिसके लिए योग अनिवार्य है। पर योग भी राजनीति से कब तक बच के रह सकता था ?? जहाँ एक तरफ रिकॉर्ड 193 देशों ने योग के लिए UN में समर्थन दिया है तो यहां ख़ुद हमारे ही देश मे दिग्विजयसिंह जैसे बुद्धजन एक पूरे एंटी योग खेमे के प्रतिनिधित्व कर के ये सिद्ध कर रहे है कि वो औरो से अलग सोचते है। वो पतंजलि के विचारों का खंडन कर अपनी दलगत राजनीत को वैचारिक मजबूती दे रहे है।
लगे हाथ ये नारा भी लगा लेना चाहिए कि सर कटा सकते है लेकिन भ्रामरी कर सकते नही।

 योग भी खुद सोच रहा होगा कि कहा चलते चलते  UN तक पहुच गया। यहां गुमनामी के अंधेरो में कुछ योगियों तक था तब तक खुश था। अब कुछ लोगोे से मिले रिजेक्शन के बाद मुझे खुद पे डाउट होने लगा है। घुटन होती है राजनीतिक लांछनों से।

योगा चर्चो में आने से पहले सबका था जब से मोदीजी ने इसे विश्व मंच पर लाया ये बस कुछ राइट विंग एक्टिविस्ट का बन गया है। लोगो ने ज्यूँ ही योगा के अपने अधिकारों को छोड़ा तो योग भी गहरी लंबी साँस अंदर की तरफ लेते हुए मोदीजी से बोला की "ना जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम, की दुनिया समझ रही है सब कुछ तेरा हूँ मै"
किसी दुकान से कोई बेहतरीन प्रोडक्ट ले आने के बाद हम उस दुकान के और उत्पादों में भी दिलचस्पी लेने लगते हैं। मोदीजी की मार्केटिंग स्किल और योग जैसे खरे प्रोडक्ट की वजह से आज दुनिया के लोगों का भारत की तरफ रुझान बढ़ा है लोग भारत की सांस्कृतिक विरासत की तरफ उम्मीद की नजर से देखते हैं आज वह हिमालय और गंगा की तरफ योग की वजह से आकर्षित हुए हैं। हमारे धार्मिक साहित्य ग्रंथों शास्त्रीय संगीत व नृत्य ग्रामीण रीति रिवाजों आदि की अच्छी मार्केटिंग करके हम भारत को ज्यादा अपीलिंग बना सकते है।

तारीफ करनी होगी योगा जैसे इनिशिएटिव की आज इसकी वजह से हमारे पास महंगी एलोपैथिक मेडिसिन का बेहतरीन विकल्प है। इसकी वजह से भारत के कई बेरोजगार युवाओ के पास योग शिक्षक बनकर योग का प्रचार-प्रसार करने के अवसर मौजूद हैं । इस शुरुआत के बाद वर्ष वर्षों तक नेगलेक्ट रहे योगी और ऋषियो के भी अच्छे दिन आ गए हैं। रामदेव जी के स्वदेशी ब्रांड पतंजलि को विदेशों में भी अच्छा हाइप मिल रहा है।
योग जैसी भारत की ऐसी कई गुमनाम विधाओं के बारे में Google पर खोजा जा रहा है ।
आयुर्वेद योगा यूनानी सिद्धा तथा होम्योपैथिक के योग से बना भारत का इंडिजेनस आयुष मेडिसिन सिस्टम अब अंधेरों से उजालों की तरफ चल पड़ा है । बहुत मुमकिन है कि कल इसका पूरे विश्व में नाम हो जाए ।
 कल को हम जर्मनी को भी पछाड़ कर विश्व की सबसे बड़ी सॉफ्टपॉवर बन सकते हैअगर इसके विकास में उठाए गए कदम राजनीति का शिकार ना हो।

 विदेशियों को पश्चात्यता से टशन दिखाना भूल होगी। तो क्यूँ न योग जैसी हमारी सांस्कृतिक जड़ों को हमारे समर्पण से सींच कर हम गर्व करने का मौका भुना ले।  योग के ब्रांड एंबेसेडर बनना हमारा हक भी है और जिम्मेदारी भी।इसलिए आओ मिलकर योग करें और योग का प्रचार करें।

सबको सूर्यनमस्कार ।
#Kapil
#InternationalYogaDay

Thursday, June 15, 2017

देशभक्ति यूँ भी।

ये पोस्ट मेरे कुछ मित्र जिन्होंने सवाल किया और जो नही कर पाए उन सब की जिज्ञासाओं को समर्पित है।

सवाल था कि गरीबी, बेरोजगारी , मूल्य वृद्धि की चर्चा क्यों नही हो रही। सरकार की नाकामयाबी और  नाकाफी प्रयास सवालों से महफूज़ क्यूँ है ??
दूसरा सवाल था जब नक्सलवाद ,क्रोसबोर्डर टेरोरिसम से भी ज्यादा प्रभावित कर रहा है देश को फिर , पाकिस्तान से ही इतनी नफरत क्यूँ ?? नक्सलियों से सहानुभूति किस लिए ??

 जन्म और विचारो से में एक भारतीय हूँ। आज़ादी की लड़ाई न लड़ पाने का मलाल होता था मुझे बचपन मे , मेरे जैसे कइयो का खून खोल उठा होगा जब बंगाल के छोटे से मिदनापुर के खुदीराम बॉस और चंडीगढ़ के खटकड़कलां गाँव के भगत सिंह जैसे महान देशभक्तों को मिली फाँसी की सज़ा की मार्मिक कहानी पढ़ी होगी।
 छोटी छोटी जगह से आए उन ज़ुनूनी,दलेर योद्धाओं के अपने वतन के लिए समर्पण की कहानी के वाचक और खुद को उन शहीदों के उपकारों से उऋण करने की हसरत लिए अपनी बौद्धिक सीमाओं में रहते हुए उन जिज्ञासाओं को एड्रेस करने अपने तर्क प्रस्तुत कर रहा हूँ।

   घर मे अपने बेटे का उत्पात और गुस्ताखियां क्षम्य है इस हेतु हमारे द्वारा कठोरता की बजाय अन्य माइल्ड रास्ते इख्तियार करना ठीक होता है।
पर पड़ोसी आपसी रंजिश के चलते अगर आपके घर के बर्तन गिरा दे ,आए दिन आपके घर पत्थरबाज़ी करे, टीवी फोड़ दे ऐसे में उस पड़ोसी के लिए घर के किसी सदस्य का झुकाव समझ से बाहर है। तब परिवार के सदस्य के रूप में हर छोटे से छोटे बच्चे को घर की प्रतिष्ठा और पिता के आत्मसम्मान हेतु उस पड़ोसी से नफरत करना ही उसका ही आपेक्षित है न कि उस पड़ोसी के लिए सॉफ्टकोर्नर रखना । फिर घर के बच्चो को वो आइसक्रीम या टॉफी दे कर बरगलाए या कोई दोस्ती का वास्ता दे दे पर बच्चे का ये सबसे पहला धर्म है कि वो घर के खिलाफ आँख उठाने वाले कि तरफदारी ना करे।

रही बात घर की गरीबी की तो समझने की कोशिश करे कि घर का मुखिया तभी अच्छे से मजदूरी कर पाएगा और रोजी रोटी कमा पाएगा जब उसे पड़ोसियों से अपने घर परिवार की चिंता न हो। मानसिक शांति के बिना भौतिक खुशहाली महज भ्रम है फरेब है। दूध को बिल्ली से सुरक्षित रखने का आला न हो घर मे फिर दुधारू पशुओं को खरीद भी ले तो क्या फायदा।

CSSO के आंकड़ों के अनुसार CPI कंज्यूमर प्राइज़ इंडेक्स मई में रिकॉर्ड निचले स्तर 2.18 पे है। और WPI में भी कमी दर्ज की गई हैं । सरकारी आंकड़े बता रहे है कि गरीबी भी गत कुछ वर्षों में लोगो को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं जैसे विधुतीकरण और सड़क कनेक्टिविटी की वजह से कम हुई है।

फिर भी एक बार को मान ले कि जस्टिन बीबर को हायर करने से हम गरीब हो गए हो तो क्या ऐसी गरीबी और  महंगाई, ध्रुवीकरण,आतंकवाद,अलगाववाद आदि से बड़ी समस्याएं है??

नक्सलियों पे नकेल कसने वाले थिंक टैंक देश के भटके हुए नोजवानो की वजह से कंसंट्रेट नही कर पा रहे है। हमारे देश की विदेश नीति हमारे दो उदंड पड़ोसियों को काउंटर करने के सिवा कुछ ज्यादा कर नही पाती। टेरोरिसम कम हो तब ट्रेड होगा। ट्रेड से ग्रॉस नेशनल इनकम बढ़ेगी, पर कैपिटा इनकम बढ़ेगी। पर यहां सिन अलग है। युवा बॉस और भगत को भुला कर आतंकी अफज़ल के सामने शर्मिंदा होने का कन्फेशन कर रहे हो। देश को अक्षुण्ण बनाए रखनी वाली आर्मी पे इल्ज़ामों की बरसात हो रही हो। याकूब और अफजल को डिफेंड करने वाले बुद्धिजीवियों के बीच कोई देश निवेश को कैसे सुरक्षित महसूस कर सकता है। मेक इन इंडिया का मजाक बनाते ये भूल जाते है कि हम रोजगार माँग रहे थे, गरीबी पे चिंतित हो रहे थे। मुद्दों पे सरकार को घेर रहे थे।

संविधान प्रदत्त अधिकार हमे पहले मिल गए और कर्त्तव्य संविधान ने काफी बाद में दिए है। फिर भी हमे पहले से मिले अधिकारों का इल्म है पर कर्तव्यों का बोध नही।
सरकार को जिम्मेदारियां बता देते है पर हम वो आईना खुद कभी नही देखते। देश विरोधी गुस्ताखियों पे कोई कब तक मौन रहे ??
 मोदीजी कड़ी निंदा में मीर बन के कह रहे है "वो जो हममे तुममे करार था तुम्हे याद हो के न याद हो" वक्त आ गया है हम मौन मज़बूरियों के संवाद को पढ़े।

 महगाई क्यों न होगी जब लास्ट फिस्कल ईयर का 7% मिलिट्री बजट बढा कर दो लाख पिचहत्तर हजार करोड़ कर दिया है। इंडिया डिफेंस पे सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में दूसरे नम्बर पे है क्योंकि हमें पाकिस्तान और चाइना जैसे दुश्मनों से खुद को बचाए रखना है।

देश को बाहरी दुश्मनों से बचाना है और यहा देश की दीमकें हर कदम पर अपना प्रभाव दिखा रही है । जिसके चलते किसान अनाज फेक रहा है।
कश्मीरी पत्थर फेंके रहा है। पढ़े लिखे लिबरल ज्ञान बम फेंक रहे है और थोड़े कम ज्ञानी लेफ्टिस्ट,वैचारिक समर्थन देने क्या क्या फेंके जा रहे है। कुछ लोग जवाबी कार्यवाही में जुटे फेंक रहे है।ऐसे रेंडम ट्रैफिक के माहौल में कोई कैसे विकास रथ को हाँक पाएगा ??

जरूरत के उत्पादों का कम हो जाना ही है महंगाई। जनाब देशभक्ति, देश के लिए समर्पण के विचारों की उपज के बारे में सोचिए , कितनी कम हो चुकी हैं ये। ये भी एक प्रकार की महंगाई है जो कि यकीन मानिए कई गुना ज्यादा खतरनाक है।
देशवासियों में सकारात्मकता की टाइट पालिसी से हमें इस खतरनाक इन्फ्लेशन को रोकना होगा। अन्यथा देश की अखंडता के खरीददार अपने लोगो के बीच हाहाकार मचा देंगे।
धन्यवाद।
#Kapil

#Economics #Integrity #InternalSecurity