Thursday, June 15, 2017

देशभक्ति यूँ भी।

ये पोस्ट मेरे कुछ मित्र जिन्होंने सवाल किया और जो नही कर पाए उन सब की जिज्ञासाओं को समर्पित है।

सवाल था कि गरीबी, बेरोजगारी , मूल्य वृद्धि की चर्चा क्यों नही हो रही। सरकार की नाकामयाबी और  नाकाफी प्रयास सवालों से महफूज़ क्यूँ है ??
दूसरा सवाल था जब नक्सलवाद ,क्रोसबोर्डर टेरोरिसम से भी ज्यादा प्रभावित कर रहा है देश को फिर , पाकिस्तान से ही इतनी नफरत क्यूँ ?? नक्सलियों से सहानुभूति किस लिए ??

 जन्म और विचारो से में एक भारतीय हूँ। आज़ादी की लड़ाई न लड़ पाने का मलाल होता था मुझे बचपन मे , मेरे जैसे कइयो का खून खोल उठा होगा जब बंगाल के छोटे से मिदनापुर के खुदीराम बॉस और चंडीगढ़ के खटकड़कलां गाँव के भगत सिंह जैसे महान देशभक्तों को मिली फाँसी की सज़ा की मार्मिक कहानी पढ़ी होगी।
 छोटी छोटी जगह से आए उन ज़ुनूनी,दलेर योद्धाओं के अपने वतन के लिए समर्पण की कहानी के वाचक और खुद को उन शहीदों के उपकारों से उऋण करने की हसरत लिए अपनी बौद्धिक सीमाओं में रहते हुए उन जिज्ञासाओं को एड्रेस करने अपने तर्क प्रस्तुत कर रहा हूँ।

   घर मे अपने बेटे का उत्पात और गुस्ताखियां क्षम्य है इस हेतु हमारे द्वारा कठोरता की बजाय अन्य माइल्ड रास्ते इख्तियार करना ठीक होता है।
पर पड़ोसी आपसी रंजिश के चलते अगर आपके घर के बर्तन गिरा दे ,आए दिन आपके घर पत्थरबाज़ी करे, टीवी फोड़ दे ऐसे में उस पड़ोसी के लिए घर के किसी सदस्य का झुकाव समझ से बाहर है। तब परिवार के सदस्य के रूप में हर छोटे से छोटे बच्चे को घर की प्रतिष्ठा और पिता के आत्मसम्मान हेतु उस पड़ोसी से नफरत करना ही उसका ही आपेक्षित है न कि उस पड़ोसी के लिए सॉफ्टकोर्नर रखना । फिर घर के बच्चो को वो आइसक्रीम या टॉफी दे कर बरगलाए या कोई दोस्ती का वास्ता दे दे पर बच्चे का ये सबसे पहला धर्म है कि वो घर के खिलाफ आँख उठाने वाले कि तरफदारी ना करे।

रही बात घर की गरीबी की तो समझने की कोशिश करे कि घर का मुखिया तभी अच्छे से मजदूरी कर पाएगा और रोजी रोटी कमा पाएगा जब उसे पड़ोसियों से अपने घर परिवार की चिंता न हो। मानसिक शांति के बिना भौतिक खुशहाली महज भ्रम है फरेब है। दूध को बिल्ली से सुरक्षित रखने का आला न हो घर मे फिर दुधारू पशुओं को खरीद भी ले तो क्या फायदा।

CSSO के आंकड़ों के अनुसार CPI कंज्यूमर प्राइज़ इंडेक्स मई में रिकॉर्ड निचले स्तर 2.18 पे है। और WPI में भी कमी दर्ज की गई हैं । सरकारी आंकड़े बता रहे है कि गरीबी भी गत कुछ वर्षों में लोगो को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं जैसे विधुतीकरण और सड़क कनेक्टिविटी की वजह से कम हुई है।

फिर भी एक बार को मान ले कि जस्टिन बीबर को हायर करने से हम गरीब हो गए हो तो क्या ऐसी गरीबी और  महंगाई, ध्रुवीकरण,आतंकवाद,अलगाववाद आदि से बड़ी समस्याएं है??

नक्सलियों पे नकेल कसने वाले थिंक टैंक देश के भटके हुए नोजवानो की वजह से कंसंट्रेट नही कर पा रहे है। हमारे देश की विदेश नीति हमारे दो उदंड पड़ोसियों को काउंटर करने के सिवा कुछ ज्यादा कर नही पाती। टेरोरिसम कम हो तब ट्रेड होगा। ट्रेड से ग्रॉस नेशनल इनकम बढ़ेगी, पर कैपिटा इनकम बढ़ेगी। पर यहां सिन अलग है। युवा बॉस और भगत को भुला कर आतंकी अफज़ल के सामने शर्मिंदा होने का कन्फेशन कर रहे हो। देश को अक्षुण्ण बनाए रखनी वाली आर्मी पे इल्ज़ामों की बरसात हो रही हो। याकूब और अफजल को डिफेंड करने वाले बुद्धिजीवियों के बीच कोई देश निवेश को कैसे सुरक्षित महसूस कर सकता है। मेक इन इंडिया का मजाक बनाते ये भूल जाते है कि हम रोजगार माँग रहे थे, गरीबी पे चिंतित हो रहे थे। मुद्दों पे सरकार को घेर रहे थे।

संविधान प्रदत्त अधिकार हमे पहले मिल गए और कर्त्तव्य संविधान ने काफी बाद में दिए है। फिर भी हमे पहले से मिले अधिकारों का इल्म है पर कर्तव्यों का बोध नही।
सरकार को जिम्मेदारियां बता देते है पर हम वो आईना खुद कभी नही देखते। देश विरोधी गुस्ताखियों पे कोई कब तक मौन रहे ??
 मोदीजी कड़ी निंदा में मीर बन के कह रहे है "वो जो हममे तुममे करार था तुम्हे याद हो के न याद हो" वक्त आ गया है हम मौन मज़बूरियों के संवाद को पढ़े।

 महगाई क्यों न होगी जब लास्ट फिस्कल ईयर का 7% मिलिट्री बजट बढा कर दो लाख पिचहत्तर हजार करोड़ कर दिया है। इंडिया डिफेंस पे सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में दूसरे नम्बर पे है क्योंकि हमें पाकिस्तान और चाइना जैसे दुश्मनों से खुद को बचाए रखना है।

देश को बाहरी दुश्मनों से बचाना है और यहा देश की दीमकें हर कदम पर अपना प्रभाव दिखा रही है । जिसके चलते किसान अनाज फेक रहा है।
कश्मीरी पत्थर फेंके रहा है। पढ़े लिखे लिबरल ज्ञान बम फेंक रहे है और थोड़े कम ज्ञानी लेफ्टिस्ट,वैचारिक समर्थन देने क्या क्या फेंके जा रहे है। कुछ लोग जवाबी कार्यवाही में जुटे फेंक रहे है।ऐसे रेंडम ट्रैफिक के माहौल में कोई कैसे विकास रथ को हाँक पाएगा ??

जरूरत के उत्पादों का कम हो जाना ही है महंगाई। जनाब देशभक्ति, देश के लिए समर्पण के विचारों की उपज के बारे में सोचिए , कितनी कम हो चुकी हैं ये। ये भी एक प्रकार की महंगाई है जो कि यकीन मानिए कई गुना ज्यादा खतरनाक है।
देशवासियों में सकारात्मकता की टाइट पालिसी से हमें इस खतरनाक इन्फ्लेशन को रोकना होगा। अन्यथा देश की अखंडता के खरीददार अपने लोगो के बीच हाहाकार मचा देंगे।
धन्यवाद।
#Kapil

#Economics #Integrity #InternalSecurity

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