रिजल्ट आया है आज शाम, चयनित छात्रों में मेरा नाम नहीं था इसलिए माथा फ्लैशबैक में बीते इवेंट्स को सोच-सोचकर भारी हुआ जा रहा था। कि किस तरह बहुत सारी परिस्थितियों से समझौते करते हुए, बच्चों की खुशियों को ताक पर रखते हुए, घर के बहुत से जरुरी कामों को छोड़कर, मन की बहुत सारी इच्छाओं को दमित कर अपने आपको किताबों के हवाले कर दिया था। बावजूद इसके में कट ऑफ मार्क से थोड़ा कम पड़ गया।
ऐसा होता है हर ख्वाहिश हमारी पूरी हो जरूरत नहीं, सच कहा है किसी ने सपने देखते हुए थोड़ी सावधानी जरूरी है। ऐसा नहीं है कि यह लक्ष्य बहुत मुश्किल है जिसे छुआ नहीं जा सकता पर "आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक" फिर कौन जीता है जुल्फ के सर होने तक...
इस छोटी सी जिंदगी में हजारों छोटी-छोटी ख्वाहिशे है तमन्नाए है पर उस पर हमारी ईगो भरी एक भारी भरकम ख्वाहिश का साया है जो सभी छोटी ख्वाहिशों की हिस्से का पोषण अपनी लंबी जड़ों से सोख लेती है। छोटी ख्वाहिशें भी यह सोच कर दम तोड़ देती है कि उनका समर्पण बेकार नहीं जाएगा और एक दिन यह बड़ी ख्वाहिश बड़े छायादार और फलदार वृक्ष में तब्दील हो जाएंगी तब हमारी अधूरी ख्वाहिशें पूरी होंगी। पर यह नादान यह नहीं जानती की वक्त की कुल्हाड़ी ख्वाहिशों की नब्ज़ न काटे यह तकदीर और प्रार्थनाओं पर निर्भर है। परिणाम को देख कर दिल ग़ालिब हुए जा रहा हैं "बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले"
इस छोटी सी जिंदगी में हजारों छोटी-छोटी ख्वाहिशे है तमन्नाए है पर उस पर हमारी ईगो भरी एक भारी भरकम ख्वाहिश का साया है जो सभी छोटी ख्वाहिशों की हिस्से का पोषण अपनी लंबी जड़ों से सोख लेती है। छोटी ख्वाहिशें भी यह सोच कर दम तोड़ देती है कि उनका समर्पण बेकार नहीं जाएगा और एक दिन यह बड़ी ख्वाहिश बड़े छायादार और फलदार वृक्ष में तब्दील हो जाएंगी तब हमारी अधूरी ख्वाहिशें पूरी होंगी। पर यह नादान यह नहीं जानती की वक्त की कुल्हाड़ी ख्वाहिशों की नब्ज़ न काटे यह तकदीर और प्रार्थनाओं पर निर्भर है। परिणाम को देख कर दिल ग़ालिब हुए जा रहा हैं "बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले"
अब दिल को बहलाने के लिए सब्र हिम्मत और मजबूत इरादों की प्रार्थनाओं का दौर चलेगा। मां बाप कितनी जल्दी अपने आपको हसरतो और हालातो के बीच एडजस्ट कर लेते हैं। जो मेरे सफल होने के समाचार की बड़ी शिद्दत से इंतजार कर रहे थे। जैसे ही पता चला कि मैं ऐसा नहीं कर पाया तुरंत बोले "हमें क्या जरूरत है ठीक है एग्जाम था दिया" एक पल में ऐसा एहसास करा दिया कि जैसे यह सबसे तुच्छ एग्जाम जो उनके बेटे की विलक्षण प्रतिभा के आंकलन में नाकामयाब रहा ।
तभी कहा जाता है कि आपके अपने परिवार से ज्यादा आपका और कोई नहीं होता। मुझसे खुशी या गम कुछ भी छुपाया नहीं जाता। और ना ही छुपाने का कभी कोई इरादा रहता है ।
तभी कहा जाता है कि आपके अपने परिवार से ज्यादा आपका और कोई नहीं होता। मुझसे खुशी या गम कुछ भी छुपाया नहीं जाता। और ना ही छुपाने का कभी कोई इरादा रहता है ।
कुछ दिनों से घर मे छोटे बड़े सब मेरे मोबाइल पर सोशल मीडिया यूज़ करने से चिढ़े हुए रहते थे। इस बात का मुझे इल्म था मैं खुद भी चाहता था की उसको मैं कम करूं। असल में मेरे WhatsApp और Facebook पर बहुत सारे स्टडी रिलेटेड ग्रुप से है लेकिन में मानता हूं हर बार यहां पढ़ाई की बातें नहीं होती। इधर-उधर के गप्पे मारा करते हैं।
मैं इंटेंशनली इन गप्पेबाजो को एक्सेस नहीं करता हूँ । नेट पर कुछ सर्फ करते हुए बहुत बार नोटिफिकेशन आ जाते हैं। कभी गलती से भी क्लिक हो गया तो यह आपको उसी दोस्तों की महफिल में ले जाते हैं। जहां से आपका वापस आना दोस्तों की इजाजत पर निर्भर करता है। इसी तरह अक्सर औकात पढ़ाई के बदले दोस्तों के साथ बतियाने में बीत जाती हैं । इस बार मैंने सोच रखा था कि मेरा रिजल्ट कुछ भी हो। मेंस में अगर पास हुआ तो इंटरव्यू की तैयारी के लिए और अगर नहीं हो पाया तो फिर से प्री की तैयारी के लिए मैं इन दोस्ती के अड्डो सोशल मीडिया से वैलिड दूरी बना लूंगा । पर रिजल्ट देखते ही लेफ्ट हो जाना मुझे थोड़ा कायरता जैसा लगा इसलिए मैंने फैसला किया है की ग्रुप से लेफ्ट होने के बजाए एप्लीकेशन को ही अनइंस्टॉल कर दो ताकि ना रहेगा बांस ना नीरो बांसुरी बजाएगा फिर रोम के जलने का सवाल ही नहीं लेकिन उन रिश्तेदारों का क्या जो कब से बाट देख रहे थे मेरे परिणाम की, उन दोस्तों की जिज्ञासाओं का क्या जो हर बार मिलने पर RAS क्या हाल है भाई तेरे बोल के संबोधित करते थे?? इसलिए मैंने सोचा की Facebook और WhatsApp Twitter पर एक सांकेतिक संदेश छोड़ दूं ताकि सब को फोन करके मेरा परिणाम जानने की तकल्लुफ न करना पड़े। ना पास हुआ है ऐसा तो क्या लिखता फिर मैंने अपनी इज्जत को थोड़ी नरमी बख्शी और लिखा पेशेंस इज़ इंपॉर्टेंट फॉर सक्सेस की धैर्य सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक है मैं खुद ही अपने आपको समझा रहा था यह पढ़ पढ़ कर समझदार हो गया हूं।
एक दिन बीता है WhatsApp Facebook और Twitter के बिना, शुरू में थोड़ी सी विड्रॉल सिम्टम्स आ रहे थे पर लक्ष्य बड़ा है तो समर्पण भी बड़ा चाहिए। क्या फर्क पड़ जाएगा अगर अपने दिमाग की जीत के लिए थोड़ा बहुत मन हार जाऊं?
यह एग्जाम जो शुरुआत में मेरी ज़िद था अब मेरी आशिकी बन गया है और आशिकी सब्र चाहती है और तमन्नाओं की बेताबी को इशारो से खामोश करती है अब रामप्रसाद बिस्मिल की तरह सरफरोशी वाली फिलिंग हमारे भी दिल में हैं देखना है जोर कितना बाजुए आरपीएससी के है।😉😀
जय हो।

